कमरछठ: संतान की दीर्घायु से लेकर प्रकृति और खेती तक, जानिए इस लोकपर्व का महत्व

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है और यहां की लोकसंस्कृति खेती-किसानी और प्रकृति से गहराई से जुड़ी है. इसी परंपरा का अहम पर्व है कमरछठ, जिसे हलछठ, हलषष्ठी और हरछठ भी कहा जाता है. भाद्र मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर माताएं संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए व्रत रखती हैं. कमरछठ की खासियत इसकी धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ सगरी, पौधों की पूजा और कृषि संस्कृति से जुड़ी परंपराएं हैं. छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय पाठक ने इस पर्व के इतिहास, मान्यताओं और परंपराओं की जानकारी दी.

खेती-किसानी से जुड़ा है पर्व

डॉ. विनय पाठक के अनुसार छत्तीसगढ़ के ज्यादातर पारंपरिक त्योहारों का संबंध कृषि और ग्रामीण जीवन से है. हरेली में कृषि उपकरणों की पूजा होती है, वहीं कमरछठ में भी हलधर और किसान जीवन की झलक दिखाई देती है.

हलधर और षष्ठी देवी की मान्यता

कमरछठ को भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम यानी हलधर से जोड़कर देखा जाता है. वहीं षष्ठी देवी को संतान की रक्षक माना जाता है. इसलिए माताएं बच्चों के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं.

ग्वालन की लोककथा भी प्रचलित

इस पर्व से जुड़ी कई लोककथाएं हैं. इनमें ग्वालन की कथा प्रमुख है, जिसमें सत्य और धर्म के महत्व का संदेश मिलता है. मान्यता है कि छठी देवी की कृपा और प्रायश्चित के बाद उसके मृत बच्चे को जीवन मिला. यह कथा लोगों को सत्य के मार्ग पर चलने की सीख देती है.

सगरी और पौधों की होती है पूजा

कमरछठ की खास परंपरा सगरी बनाना है. महिलाएं सामूहिक रूप से छोटा तालाब बनाकर उसमें पानी भरती हैं और आसपास बेर, पलाश यानी परसा और कांस जैसे पौधे लगाकर पूजा करती हैं. यह परंपरा जल, प्रकृति और पर्यावरण के महत्व को दर्शाती है.

बच्चों की पीठ पर लगाया जाता है पुतका

पूजा के दौरान सफेद मिट्टी यानी छुई से पुतका बनाया जाता है और बच्चों की पीठ पर लगाया जाता है. इसे संतान के स्वस्थ, मजबूत और दीर्घायु होने की कामना से जोड़ा जाता है.

लोकपर्व में दिखती है वैज्ञानिक सोच

सगरी के पानी को लेकर भी ग्रामीण समाज में एक लोकमान्यता है. पानी के टिके रहने या कम होने को मौसम और जल की स्थिति से जोड़कर देखा जाता है. डॉ. विनय पाठक के अनुसार कमरछठ जैसे पारंपरिक पर्वों में धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और वैज्ञानिक सोच भी दिखाई देती है.

छत्तीसगढ़ की पहचान है कमरछठ

कमरछठ मातृत्व, संतान की मंगलकामना, खेती और प्रकृति को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण लोकपर्व है. बदलते समय के बावजूद छत्तीसगढ़ में महिलाएं आज भी इसे पूरी आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाती हैं.

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